योग


जानिए योग दिवस पर योग।

योग शब्द के दो अर्थ हैं और दोनों ही महत्वपूर्ण हैं। पहला है- जोड़ और दूसरा है समाधि। जब तक हम स्वयं से नहीं जुड़ते, समाधि तक पहुँचना कठिन होगा । योग दर्शन या धर्म नहीं, गणित से कुछ ज्यादा है। दो में दो मिलाओ चार ही आएँगे। चाहे विश्वास करो या मत करो, सिर्फ करके देख लो। आग में हाथ डालने से हाथ जलेंगे ही, यह विश्वास का मामला नहीं है।


योग है विज्ञान : 'योग धर्म, आस्था और अंधविश्वास से परे है। योग एक सीधा विज्ञान है। प्रायोगिक विज्ञान है। योग है जीवन जीने की कला। योग एक पूर्ण चिकित्सा पद्धति है। एक पूर्ण मार्ग है-राजपथ। दरअसल धर्म लोगों को खूँटे से बाँधता है और योग सभी तरह के खूँटों से मुक्ति का मार्ग बताता है।'-ओशो


जैसे बाहरी विज्ञान की दुनिया में आइंस्टीन का नाम सर्वोपरि है, वैसे ही भीतरी विज्ञान की दुनिया के आइंस्टीन हैं पतंजलि। जैसे पर्वतों में हिमालय श्रेष्ठ है, वैसे ही समस्त दर्शनों, विधियों, नीतियों, नियमों, धर्मों और व्यवस्थाओं में योग श्रेष्ठ है।


आष्टांग योग :पतंजलि ने ईश्वर तक, सत्य तक, स्वयं तक, मोक्ष तक या कहो कि पूर्ण स्वास्थ्य तक पहुँचने की आठ सीढ़ियाँ निर्मित की हैं। आप सिर्फ एक सीढ़ी चढ़ो तो दूसरी के लिए जोर नहीं लगाना होगा, सिर्फ पहली पर ही जोर है। पहल करो। जान लो कि योग उस परम शक्ति की ओर क्रमश: बढ़ने की एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है। आप यदि चल पड़े हैं तो पहुँच ही जाएँगे।


योग वृहत्तर विषय है। आपने सुना होगा- ज्ञानयोग, भक्तियोग, धर्मयोग और कर्मयोग। इन सभी में योग शब्द जुड़ा हुआ है। फिर हठयोग भी सुना होगा, लेकिन इन सबको छोड़कर जो राजयोग है, वही पतंजल‍ि का योग है।


इसी योग का सर्वाधिक प्रचलन और महत्व है। इसी योग को हम आष्टांग योग के नाम से जानते हैं। आष्टांग योग अर्थात योग के आठ अंग। दरअसल पतंजल‍ि ने योग की समस्त विद्याओं को आठ अंगों में श्रेणीबद्ध कर दिया है। अब इससे बाहर कुछ भी नहीं है।


आपको ईश्वर को जानना है, सत्य को जानना है, सिद्धियाँ प्राप्त करना हैं या कि सिर्फ स्वस्थ रहना है, तो पतंजलि कहते हैं कि शुरुआत शरीर के तल से ही करना होगी। शरीर को बदलो मन बदलेगा। मन बदलेगा तो बुद्धि बदलेगी।

सतीश शर्मा जी द्वारा संकलित

योग – परिचय

1.1 योग के हर एक अंग के बारे में संक्षेप में जानकारी1.2 योग के सिद्धांत1.3 योग – स्वस्थयता का साधन।


योग संस्कृत के शब्द युज से लिया गया है । इसका अर्थ है जड़ना या बनना । इसे हम शरीर तथा मन का संयोग कह सकते हैं । योग मनुष्य के गुणों, ताकत अथवा शक्तियों का आपस में मिलना है । योग एक तरीका है । जिसके द्वारा छिपी शक्तियों (Latent Powers) का विकास होता है । योग धर्म, दर्शन, मनोविज्ञान तथा शारीरिक सभ्यता का समूह है । योग द्वारा आदमी को आत्मविश्वास प्राप्त होता है । योग का उद्देश्य शरीर को लचकदार तथा नीरोग बनाना है । यह शरीर, मन तथा आत्मा की आवश्यकताएं पूर्ण करने का एक अच्छा साधन है । शारीरिक स्वास्थ्य तथा निरोगता योग द्वारा प्राप्त करने का जो तरीका पतंजलि ने बताया है, उसे अष्टांग योग कहा जाता है । इसके आठ अंग हैं –


यम (Restrain)नियम (Observance)आसन (Posture)प्राणायाम (Regulation of breath and Bio-energy)प्रत्याहार (Abstraction)धारणा (Concentration)ध्यान (Meditation)समाधि (Trance)


योग के हर एक अंग के बारे में संक्षेप में जानकारी

1. यम – यह अनुशासन का वह साधन है, जो प्रत्येक मनुष्य के मन से सम्बन्ध रखता है । इसका अभ्यास करने से मनुष्य अहिंसा, सच्चाई, चोरी न करना, पवित्रता तथा त्याग करना सीखता है ।

2. नियम – नियम वे ढंग हैं जो मनुष्य के शारीरिक अनुशासन से सम्बन्धित हैं । शरीर तथा मन की शुद्धि संतोष, दृढ़ता तथा ईश- आराधना जैसे कि शरीर की सफाई नेति, धोती तथा बस्ती द्वारा तैयार की जाती है ।

3. आसन – मानव शरीर को अधिक से अधिक समय के लिए विशेष स्थिति में रखने को आसन कहते हैं । जैसे रीढ़ की हड्डी को बिल्कुल सीधा रखकर टांगो को किसी विशेष दिशा में रखकर बैठने को पद्मासन कहते हैं ।

4. प्राणायाम – एक स्थिर जगह पर बैठकर किसी विशेष विधि के अनुसार सांस अन्दर खींचने तथा बाहर निकालने की विधि को प्राणायाम कहते हैं ।

5. प्रत्याहार – प्रत्याहार का अर्थ मन तथा इन्द्रियों को उनकी सम्बन्धित क्रिया से हटकर परमात्मा की ओर लगाना है ।

6. धारणा – इसका अर्थ मन को किसी इच्छित विषय में लगाना है । इस प्रकार एक ओर ध्यान लगाने से मनुष्य मैं एक महान् शक्ति पैदा हो जाती है, जिस के साथ उसके मन की इच्छा पूरी हो जाती हैं ।

7. ध्यान – यह धारणा से ऊंची अवस्था है जिसमें, आदमी सांसारिक मोह जाल से ऊपर उठ जाता है तथा अपने आप में अन्तर्ध्यान हो जाता है ।

8. समाधि – समाप्ति ध के समय मानवीय आत्मा परमात्मा मैं लीन हो जातीं ।

योग के सिद्धांत

योग के प्रथम चार अंग यम, नियम आसन प्राणायाम का सांसारिक लोग अभ्यास कर सकते है’ परन्तु प्रत्याहार, धारणा, ध्यान तथा समाधि का अभ्यास योग, ऋषि मुनि ही कर सकते हैं । योग मनुष्य की शारीरिक, मानसिक तथा आत्मिक उद्देश्यों की पूर्ति वैज्ञानिक ढंगों से करता है । इसलिए .योग विशेष सिद्धान्तों पर निर्भर है, जिनकी पालना करना जरूरी है । इसके प्रमुख सिद्धान्त निम्नलिखित हैं –


1. योग अभ्यास करने वाली जगह साफ-सुथरी तथा हवादार होनी चाहिए ।

2. योग अभ्यास करने के समय पेट खाली होना चाहिए । यदि हो सके तो प्रातःकाल का समय सर्वोतम है, यदि दिन में करना हो तो खाना खाने के कम से कम चार घंटे बाद होना चाहिए ।

3. योग अभ्यास से पूरा लाभ उठाने के लिए शरीर को पौष्टिक तथा संतुलित भोजन देना बड़ा जरूरी है ।

4. योग अभ्यास करते समय मन की एकाग्रता बहुत आवश्यक है, जो मौन धारण करने से प्राप्त होती है । जब शारीरिक क्रियाएं चल रही हों तो मनोवृत्ति भी उसी ओर लगनी चाहिए ।

5. योग अभ्यास नित्यप्रति करना चाहिए ।

6. उचित मात्रा में आराम करना बहुत जरूरी है । ऐसा शरीर में ताजगी लाने हेत भी जरूरी है ।. योग करते समय जब भी थकावट हो तो श्वासन अथवा मकरासन पर लेना चाहिए । आसन समाप्त होने के बाद भी जरूरत के अनुसार शरीर को आराम की अवस्था में रखना जरूरी है ।

7. योग अपनी शक्ति अनुसार ही करना चाहिए । जब तक शरीर को कोई आसन ठीक न बैठे, आसन नहीं करना चाहिए । क्षमता से अधिक जोर लगाकर आसन करने के भयानक परिणाम निकल सकते हैं ।

8. प्रत्येक आसन आरम्भ करने से पहले फेफडों के अन्दर मौजूद हवा को सांस द्वारा बाहर निकाल देना चाहिए । इससे ‘आसन में आसानी रहती है तथा पूर्ण लाभ प्राप्त होता है ।

9. योग अभ्यास करते समय हमेशा नाक द्वारा सांस लेनी चाहिए । श्वास क्रिया का योग से बड़ा सम्बन्ध है । यह ठीक ढंग से होनी चाहिए ताकि श्वास प्रणाली के फेफड़ों में शुद्ध हवा ही पहुंचे ।

10. हवा को बाहर निकालने के बाद श्वास क्रिया रोकने का जरूर अभ्यास करना चाहिए ।

11. एक आसन करने के बाद दूसरी तरह का आसन करना चाहिए जैसे कि धनुरासन के बाद पश्चिमोतान आसन करना चाहिये

12. प्रत्येक आसन शारीरिक क्षमता के अनुसार ही होना चाहिए ।

13. आरम्भ में योगाभ्यास करते समय व्यक्ति को आसन की स्थिति में कम वक्त के लिए ही ठहरना चाहिये, परन्तु ज्यों-ज्यों उस आसन का अभ्यास लगातार होता रहे, तब कोशिश करनी चाहिए । एक जगह आसन की स्थिरता (Retention) उचित समय अनुसार जरूर हो ।

योग – स्वस्थयता का साधन

योग का यह उद्देश्य है कि व्यक्ति शारीरिक रूप से तंदुरुस्त, मानसिक रूप से दृढ़ तथा सजग, आचार विचार में अनुशासित हो । इसकी विशेषताएं निम्नलिखित हैं –


1. योग मनुष्य की शारीरिक तथा मानसिक बुनियादी शक्ति का विकास करता है । सभी आसन ही व्यक्ति की बुनियादी शक्तियों का विकास करते हैं । प्राणायाम द्वारा फेफड़ों में अधिक हवा जाती है । फेफड़ों की कसरत होती है । फेफड़ों के रोग दूर हो जाते हैं ।

2. योगाभ्यास करने से शरीर स्वस्थ रहता है । शरीर की सफाई हो जाती है जैसे कि धोती क्रिया से अमाशय साफ होता है । बस्ती क्रिया द्वारा अंतड़ियां साफ होती है । साफ शरीर सदैव नीरोग रहता है ।

3. शारीरिक अंगों में मजबूती आती है जैसे मयूरासन से टखने मजबूत होते हैं ।

4. शारीरिक अंगों में लचक आती है जैसे कि धनुआर्सन तथा हलासन रीढ़ की हड्डी की लचक बढ़ाते हैं ।

5. आसन करते समय शरीर के सारे अंग क्रिया करते हैं । किया करने से सब अंगों में मजबूती आती है, तब सारी शारीरिक प्रणालियां ठीक काम करने लगती हैं । योग क्रिया-प्राणायाम द्वारा फेफड़ों की कसरत होती है । पट्ठे मजबूत होते हैं तथा अधिक से अधिक हुवा अन्दर ले जा सकते हैं । श्वास प्रणाली का सारा काम ठीक हो जाता है ।

6. योग कान-तीन शरीर को अच्छी स्थिति (Posture) में रखता है । मानवीय स्थिति को ठीक ढंग में रखना अच्छे व्यक्तित्व का गुण है । जैसे- पदमासन करने से पीठ में कूबड़ नहीं पड़ता, पेट आगे की ओर नहीं निकलता । वृक्ष-आसन करने से घुटने आपस में नहीं टकराते ।

7. उचित आसन करने से कई रोगों का इलाज हो जाता है तथा कई रोगों की रोकथाम हो जाती है। प्राणायाम करने से फेफड़ों को बीमारियां नहीं लगतीं । वज आसन तथा मत्सेन्द्र आसन से शूगर की बीमारी ठीक हो जाती है ।

8. योग मानसिक अनुशासन लाता है । यम तथा नियम द्वारा मानवीय संवेग विकार आवश्यकता तथा अन्य अनुचित इच्छाओं पर काबू पाने की शक्ति देता है । यम की पालना करने वाला चोरी नहीं करता । अहिंसा का पालन करता है । यम के नियम का पालन करने वाला मानवीय संवेगों पर काबू पाता है ।

9. योग से मानवीय बुद्धि तेल होती है । प्राणायाम करने से साफ हवा अन्दर जाती है । खून का दौरा तेल होताहै । अन्तिम सैल तक पूरी खुराक तथा हवा पहुंचती है । तभी सारे शरीर तथा मन में चुस्ती आती है । दिमाग तेजी से काम करने लगता है जैसे कि शीर्षासन द्वारा बुद्धि तेज़ होती है, स्मरणशक्ति बढ़ती है

10. योग शारीरिक तथा मानसिक थकाकट दूर करने में सहायक होता है । यदि हम कभी सामान्य जीवन की व्यस्तताओं को पूरा करते समय शारीरिक अथवा मानसिक थकावट. के शिकार हो जाएं तो शरीर तथा मन को ताजगी प्रदान करने के लिए योगाभ्यास अच्छी क्रियाएं हैं । श्वासन मनुष्य की थकावट दूर करता है ।

11. योग मानसिक संतुलन प्राप्ति तथा ख़ुशी प्रदान का बढ़िया साधन है । पद्मासन में बैठे योगी के चेहरे का नूर उसकी शांति तथा प्रसन्नता प्रकट करता है ।

12. योगाभ्यास के समय जो सांस पर काबू रखना होता है, उससे शरीर की सारी क्रियाएं भी धीरे-धीरे करने की आदत हो जाती है । इससे शरीर में ताल आ जाती है । जो शरीर की ताकत को संयम से खर्च करती है ।

सतीश शर्मा जी द्वारा संकलित।
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