कथा कहानी


माँ का मोक....
माँ....माँ...!यह शब मैबारबार बोलकर देख रही थी और महसूस कर रही थी िक अब यह मेरेिलए के वल एक शब ही बनकर रह जानेवाला है, माँपुकारनेपर कोई नही सुनेगा, िकसी की धड़कनेमेरेइस शब को सुनकर तेज़ नही होगी , मेरी सांसो से िनकलेइस शब की गहराई मेकौन डूबेगा? मेरेिदल सेिनकलकर माँशब िकसके िदल को छुएगा ? मैअपनी उस माँसे शायद अंितम मुलाकात करनेजा रही थी। वह मरणासन िसित मेथी. एक के बाद एक, लगातार तीन िदल के दौरो नेउसके िदल को बहत कमज़ोर कर िदया था। तुरंत दी गई िचिकता भी उसेसामान नही कर पायी। उसकी दशा सुधरनेकी बजाए िबगड़ती ही जा रही थी। आज सेपहलेजब मैनेउसेआई . सी. यु . मेदेखा था तो मैखुद को संभाल नही पा रही थी, पर िफर भी चेहरेपर मुसान लाने का पयत कर रही थी कोिक िबसर पर लेटी मेरी माँकीआँ खेमेरी आँ खो मेही देख रही थी और ढूंढ रही थी िक मैउसेदेख दुखी तो नही हो रही हँ, मेरी आँ खो मेआंसूतो नही है? मैबड़ी मज़बूती के साथ कभी उसके िसर पर, कभी कनो पर तो कभी पैरो पर हाथ फे र रही थी , मुसु रातेहए उसेदेख रही थी, पुचकार रही थी उसेजैसेमाँअपनेबचेको पुचकारती है. यह तो मै उसेकह नही सकती थी या कहना नही चाहती थी िक घबराओ मत माँ, ठीक हो जाओगी.....कोिक इसकी कोई उमीद नज़र नही आरही थी और वह भी जीवन और मृतुसेलड़ते लड़तेशायद थक चुकी थी. हम, उसीकी कोख सेपैदा हए बचेभगवान से पाथरना कर रहेथेिक भगवान, उसेइन कषो सेमुक कर दो. हम उसेइस तकलीफ मे, इस अंत की यातना मेदेख नही पा रहेथे. िकनुउसेिकतनी तकलीफ हो रही होगी, हम के वल इसका अनुमान ही लगा सकतेथेकोिक वह कभी नही कहती थी िक वह तकलीफ मेहै, िक उसेकही ददरहै, या कोई उसेबचा लेवह जीना चाहती है......नही...कभी नही. उसनेतो मौन धारण कर िलया था. जब तक बोली तो के वल यही िक मुझेख़ुशी ख़ुशी िवदा करना, कोई रोना मत. वह खुद हमसेिवदा होनेको तैयार हो गई थी और हमेभी तैयार करती रहती थी.हम जब भी उससेिमलनेजाते, उसकी दशा पहलेसेख़राब ही होती थी, बस एक ही बात थी जो साई थी ....वह था उसका मौन, उसकी पतीका, मानो वह सयं अपनेअधात , अपनी भिक को परख रही हो िक वह िकतनी मज़बूत है, िकतनेधैयरके साथ अपनेपभुक़ी बाट जोह रही थी वह, िक यिद वह टूट गयी तो उसकी गुर दीका, उसकी भिक, उसका िवशास झू ठा सािबत न हो जाये....इसी िदन का तो उसेइं तज़ार था, वह कहती थी िक भागवत हमेमरना िसखाती है..... अब उसकी परीका क़ी घड़ी थी, उसेिवचिलत नही होना है. उसकी वह शांित हमेबहत हैरान करती थी. साधारण सेजर मे , या िकसी अन परेशानी मेहम िकतनेबेचैन हो जातेहै, तड़पनेलगतेहै, मदद के िलए पुकारते हैऔर उसका तो सारा शरीर........नसेफू ली हई थी, सुइयो के घाव.....अिधक ख़राब हालत मेतो हाथ पैर भी बांध िदए जाते थेतािक बेहोशी मेवह छटपटानेन लगे. चार िदन की गहन बेहोशी ( वेटीलेटर) के बाद जब आँ खेखोली तो उसनेहमेअंदर बुलवाया और कहनेलगी ....तुम मेरी आवाज़ सुना चाहतेहोगे, मुझेदेखनाचाहतेथेना... देखो मैतो ठीक हँ, चलो अपनेहाथ सेमुझेएक एक चमच दाल का पानी िपला दो.....यह सब उसनेहमारी ख़ुशी के िलए िकया. उसेमुसु रातेहए बैठेदेख उस िदन मैसब रह गई थी...वह बोली मै हर वक तुम सबको अपनेकरीब ही महसूस करती हँ, मुझेतुमारी आवाज़ेआती रहती है, हसताल मेकाम कर रहेहर विक मेमुझेईशर के ही रप नज़र आ रहेहै....सबको हाथ जोड़कर धनवाद देती रही. िकसी सेकोई िशकायत नही, गुसा नही. ( जबिक मुझेकई कारन नज़र आ रहेथेिजन पर गुसा आ सकता था). िफर वह आँ खेबंद करके हरी ओम....का उचारण करती हई लेट गई.घर सेहसताल , हसताल सेघर....वह कहनेलगी थी िक अपना घर तो मेरा ससुराल हैऔर हसताल मेरा माइका ......उसका अपना माइका तो उससेकब का छूट चुका था . इस समय तो उसकी कोई इचा ही बाकी नही रह गई थी . हमनेकई बार पूछा कु छ मन क़ी बात कहना चाहती हो, मायके वालो सेिमलना चाहती हो, पर हर बार उसनेना मेगदरन िहलाई, मानो सांसािरकता सेऊपर उठ गई हो, कोई बेचैनी नही, कोई छटपटाहट नही. मुझेवह िदन याद हैजब हम उसका ७५ वाँजनिदन मनानेएकितत हए थे। उसेअपनेजनिदन की ख़ुशी हो ना हो पर हम सबनेउसके बारेमेसोचा, हम इस बहानेइकठेहए, हम सब ख़ुश थेइसिलए वह भी ख़ुश थी।हँसतेहए बोली "बाल सफ़े द है, दाँत नक़ली है, घुटनेचलतेनही, शरीर मेबल नही हैयानी आम पक चुका है , कभी भी टपक सकता है"। अपनेिलए भलेही उससेखड़ा ना हआ जाए, लेिकन दरवाज़ेपर यिद कोई मदद माँगनेआ जाए तो वह ख़ुद को रोक नही पाती थी। अपनी कमता के अनुसार और कभी उससेभी बढ़कर मदद करके ही उसेचैन आता था। कभी कभी इसके िलए उसेपिरवार का िवरोध भी सहना पड़ता था िकं तुिजसनेअपनेमान समान , अपनेसुख दुःख सेऊपर उठकर, परोपकार को ही अपना धेय मान िलया हो उसेकोई कै सेसमझाए। यहाँतक िक अपनी बेिटयो को देनेकी भी उसेकोई लालसा नही थी वह तो उनेबेटी बना लेती थी जो मजबूर है, ज़ररतमंद हैऔर हमेभी उनकी मदद करनेके िलए उकसाती थी।शायद उसके कमो और िवचारो का ही पिरणाम था िक उसका पूरा पिरवार मेहनती, संसारी और समाज मेसमािनत था। जब हम छोटेथे, हमारेिपताजी का वेतन पिरवार का पालन करनेके िलए शायद पयारप नही था। ( िकं तुउनकी ईमानदारी हम सबके संतोष का बहत बड़ा कारण थी)। माँको कपड़े िसलनेका काम करना पड़ता था। िदन भर उसके हाथ िसलाई मशीन पर तेज़ी सेचलतेरहतेथे। उस कमी मेभी हमनेउसेकभी साथी होतेहए या िकसी की भावनाओ ंके पित कठोर होतेहए नही देखा। घर पिरवार के साथ साथ वह समाज सेिवका की भी भूिमका िनभाती थी। एक सेवा के द मेिनयिमत रप सेजाती और मिहलाओ ंव कनाओ ंको िसलाई कढ़ाई िसखाती, नैितक िशका देती। हमनेबचपन सेउसका यही रप देखा था िजसका पभाव सतः हम पर पड़ता रहा। ईशर के पित उसकी पूरी आसा थी लेिकन के वल मंिदरो मेदान दिकणा करना वह पयारप नही समझती थी। उसका मानना था िक जो ख़ज़ानेपहलेही भरेहए हैउनेऔर भरकर का लाभ। ( चाहेवह पूजा सलो के हो या अपनेबचो के)। अपने पराए का भेद तो उसके मन मेरती भर भी नही रहा था, िकसी को भी गलेलगानेको तैयार रहती थी।एक बार हमनेसमझनेके िलए कहा िक। मदद माँगनेवालेकी पातता तो परख िलया करो, आँ खेबंद करके हर िकसी की मदद को तैयार हो जाती हो। का पता कोई आपको मूखरबना रहा हो। िकं तुउसके जवाब नेहमेचुप कर िदया। उसनेकहा " हमेभगवान नेपातता दी है मदद करनेकी, का हम उस योग थे। अपनी पातता के अनुसार कायरकरना हमारा फ़ज़रहै। िकसी भी कायरके पीछेभावना अछी होनी चािहए, िफर उसका पिरणाम अवश ही अचा होगा। " भलेही िवदालय की औपचािरक िशका उसेअिधक पाप नही हई थी, िकं तुजीवन के अनुभवो व अपनेसकारातक दिषकोण सेउसनेजान का जो कोश पा िलया था, वह हमेसमय समय पर देती रहती थी और हमारेरप मे , पीढ़ी दर पीढ़ी उस जान को, उन संसारो को िज़ंदा रखना चाहती थी। बचपन मेिजजासावश मैनेएक बार उससेपूछा था िक माँयेसगरनकर ऊपर आकाश मेहोतेहैतो हमेनज़र को नही आते? मरनेके बाद हम सगरमेजाएँ गेया नकर मेयेकै सेपता चलेगा? उसनेबड़ेसरल तरीक़े सेसमझाया िक सगरनकर कही आकाश मेनही होते, इसी धरती पर होतेहै, वो हमेजीतेजी ही िमलतेहै। वासव मेहम अपनी सोच से, अपनेकायो सेख़ुद ही अपने जीवन को सगरया नकर बना लेतेहै। मेरेउस बालमन को यह बात पूरी तरह समझ मेभलेही ना आयी हो, लेिकन िदल मेगहरी बैठ गयी थी। जब भी कोई कष आता मैसोचती मुझसेजानेअनजानेकोई ग़लती हई होगी इसिलए यह तकलीफ़ उठानी पड़ी। और ऐसा ही िवचार आनंद के कणो मेभी आता था। इस तरह हर पिरिसित को समभाव सेसीकार करना काफ़ी हद तक आ गया था। ईशर सेिशकायत मन मेकभी नही होती थी, जीवन की िविभन पिरिसितयो की िज़मेदारी मैलेनेलगी थी।पर हाँ, इस अंत के समय मेउसेइस तरह तकलीफ़ मेदेखकर मेरेमन मेएक ही सवाल बार बार उठ रहा था िक माँने जीवन भर अचेकमरिकए िफर उसेसज़ा (नकर) को िमल रही है। इस सवाल नेमुझेबहत परेशान कर रखा था। जो भी आधाितक विक िमलता मैइसी सवाल का जवाब माँगती िकं तुिकसी के जवाब सेमुझेसंतुिष नही िमली। आिख़र इस सवाल का जवाब माँसेही मुझेिमला। जब वह मौत के मुँह सेवापस आयी थी, पाँच िदन वेिटलेटर पर रहनेके बाद ठीक होकर घर आयी तब उसनेअपनेअनुभव बताए। पूरेशरीर मेसुइयो के िनशान देखकर मैनेपूछा था िक उस समय आपको बहत तकलीफ़ हो रही होगी ना, हाथ पैर भी बांधेहए थे। साँस लेनेमेभी तकलीफ़ हो रही होगी। पर उसके उतर ने मुझेना के वल हैरान कर िदया , मेरा िदल हला कर िदया बिल मेरेउस सवाल के बोझ सेमुझेमुक कर िदया। उसनेबताया िक तुमेलग रहा था िक मैददरमेहँ, मुझेकष हो रहा हैलेिकन मैतो ख़ुद को परम धाम मेमहसूस कर रही थी। असीम आनंद की िसित मेथी मै। उस समय बोल नही पा रही थी वरना तुम सबको मैयेबताना चाहती थी िक मैख़ुद को ईशर के हाथो मे अनुभव कर रही हँ। इसके बाद तो माँनेएक ऐसी बात बोली िजसेयिद कोई और कहता तो शायद मैपूरी तरह िवशास भी न कर पाती। हआ यह था िक उसके कषो को देखतेहए हम भाई बहनो के मन मेआया िक उनके हाथ सेदान करवा िदया जाए, यिद कही साँस अटक रही हैतो उनेमुिक िमल जाएगी कोिक हमारी समझ सेतो वह बहत तकलीफ़ झेल रही थी और हम उसेइस हालत मेदेख नही पा रहेथे। दोनो भाई उनके आस पास खरेहो गए और कु छ पैसो को उनके हाथो सेछूतेहए कहा िक माँ, हम आपके हाथ सेयह दान करवा रहेहै। उनेनही पता था िक माँसुन भी रही हैया नही। िकं तुआज माँनेबताया िक वह सब सुन पा रही थीअपनेबेटो की यह बात सुनकर तो उसेअचानक महसूस हआ मानो िकसी नेउसेधरती सेउठाकर राजिसंहासन पर िबठा िदया हो। उसके अंदर नयी जान आ गयी। वह उसके िलए परम आनंद का कण था। उसका यह अलौिकक अनुभव था िजसनेउसेऔर छह महीनेहमारेबीच रखा। आज, िफर सेहसताल मेभती है, पांच िदन हो गए, घर सेइस बार तो यही कहकर चली थी िक़ अब शायद वापस नही आउंगी। दूसरेही िदन मैजब उससेिमलनेगई थी , वह अिसर सी बैठी थी, मुझेदेखतेही उसकी आँ खेनम हो गई, मैउसका िसर सीनेसेलगाकर खड़ी रही. कु छ देर अपनेआँसुओ ंको रोक कर उसेसहलाती रही और लौटतेहए मुझेलगा िक शायद उसे आिख़र बार देख रही हँ। लेिकन मैनेघबराना नही था। यही माँनेिसखाया था। बचपन मेजब मैबीमार होती थी तो वह चेहरे पर मुसान रखकर मेरी देख रेख करती थी, सदा सकारातक सोचती व बोलती थी। उसकी इसी सकारातक सोच के पिरणामसरप मैगमीर बीमारी सेभी बाहर आ जाती और जली ही सू ल जानेलायक हो जाती। जब मैमाँबनी, तब भी उसनेमुझेहमेशा धैयरकी ही िशका दी। अपनेबचो की अससता मेमेरी परेशानी को भाँप कर वह िकतनेसहज भाव से कहती िक "यह तो जीवन का कम है , कभी सुख तो कभी दुःख। आज तूइन अनुभवो सेसीख रही है, कल देखना औरो को धैयरव िहमत की सीख देपाएगी"। आज उसकी वही िशका काम कर रही थी। रात भर मुझेनीद नही आयी। उसके खीच कर साँस लेनेकी आवाज़ कानो मेगूँज रही थी मानो हर साँस के साथ पभुको पुकार रही हो। अगलेिदन घर के सभी सदस उसेिमलनेजा रहेथेशायद सभी को कु छ अंदेशा हो रहा था। सू ल सेजली िनकलकर मैभी सीधा असताल पहँची। शायद वो मेरा इनज़ार ही कर रही थी। मैनेजाकर उसके िसर पर हाथ फे रा, उसने एक लमी साँस ली, आँ खेबंद थी, एक बार बस गदरन घुमाई , ज़ुबान का आकार ऐसा हो गया मानो ऊम का उचारन करना चाहती हो। होठो पर तुलसी दल था, आिख़री लमी साँस, शरीर नेदो झटके िलए और हमेशा के िलए शांत .......। चेहरेपर अंत तक एक िशकन नही आया, थोड़ी देर लगता रहा शायद अभी आँ खे खोलेगी लेिकन वो तो सदा के िलए बंद हो गयी थी। अपनी जननी को मैनेअपनी आँ खो के सामनेमृतुकी गोद मेजातेहए देखा। नही, वह उसकी मृतुनही बिल मोक था िजसके िलए वह लमेसमय सेतैयारी कर रही थी, वासव मेजीतेजी ही वह उस मोक की िसित को पाप कर चुकी थी। उसकी पिवत उपिसित हम आज अनुभव करतेहै, वह हमेशा हमेसतकमो की ओर पेिरत करती हैऔर करती रहेगी। िचता बंस
ल।

हिंदी की विकास यात्रा

हिंदी भाषा का नाम लेते ही मन रोमांच से परिपूर्ण हो जाता है | इसलिए तो कहा है -

"सुंदर है, मनोरम है, मीठी है, सरल है,
ओजस्विनी है और अनूठी है ये हिन्दी ||"

हिंदी भाषा केवल भाषा नहीं है, अपितु सभी भाषाओं में लोकप्रिय होने के साथ जनमानस के पटल पर ऐसे अंकित है, जैसे शब्दों में बिंदी रहती है | कोई भी भाषा सदैव एक-सी नहीं रहती है, बल्कि समय के अनुसार अपने में परिवर्तन करते हुए निरंतर विकास के पथ पर अग्रसर रहती है | हिंदी भाषा इतनी उदार है कि इसने उर्दू, अरबी, फारसी आदि सभी भाषाओ के शब्दों को अपने में समाहित किया हुआ है और फिर भी प्रफुल्लित और पुष्पित है | हिंदी की आदि जननी ‘संस्कृत’ है | परन्तु इसके इतिहास का आरम्भ ‘अपभ्रंश भाषा’ से माना जाता है | मूलतः 'हिंदी' फारसी शब्द है | जिसका अर्थ- 'हिंदी की' या 'हिन्द' से संबंधित है | पूर्वकाल में देखा जाये तो अंग्रेजों ने अंग्रेजी भाषा का प्रचुर मात्रा में प्रसार किया और उसका स्थापित्य करने में ही योगदान दिया | परन्तु स्वाधीनता के बाद हिंदी के प्रसार ने गति पकड़ी और अपने विकास की यात्रा शुरू की |

बहुभाषिकता की दृष्टि से देखा जाये तो भारत में कई भाषाएँ संपर्क भाषा का काम करती हैं । प्राचीन भारत में यह भूमिका संस्कृत ने निभाई और आधुनिक भारत में यह काम हिंदी कर रही है । यह भी देखा जा सकता है कि जब-जब भारत में कोई आंदोलन खड़ा हुआ, तब-तब उन आंदोलनों में हिंदी भाषा को अपनाया। यही आवश्यकता 19वीं-20वीं शताब्दी में स्वतंत्रता आंदोलन में भी देखी जा सकती है । इसलिए महात्मा गाँधी और अन्य ने हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठा प्रदान की और यही आधार राजभाषा के रूप में भी हिंदी की प्रतिष्ठा का रहा। आज 21वीं शताब्दी में हिंदी भाषा अपनी इन्ही विशेषताओं के कारण वैश्विक विस्तार के नए आयाम छू रही है | इसे हिंदी के संदर्भ में संचार माध्यम की बड़ी देन कहा जा सकता है। तकनीकी क्षेत्र में भी हिंदी की बहार दिखाई देती है | जैसे- सोशल नेटवर्किंग और ब्लॉगिंग में । जिस अंदाज में हिंदी विश्व ने फेसबुक को अपनाया है, वह अद्भुत है । डॉ. वेदप्रताप वैदिक ठीक कहते हैं कि- "हिन्दी और संस्कृत मिलकर संपूर्ण कम्प्यूटर-विश्व पर राज कर सकती हैं। वे इक्कीसवीं सदी की विश्वभाषा बन सकती हैं।" कंप्यूटर और इंटरनेट पर भी हिंदी ने अपना सिक्का जमा दिया हैँ। इस समय हिंदी में वैबसाइटे, ईमेल, चैट तथा अन्य हिंदी सामग्री उपलब्ध हैं । इसी प्रकार मोबाइल फ़ोन पर भी हिंदी भाषा प्रयोग की जा रही है।

इसके अलावा हिंदी का कुंजी पटल भी उपलब्ध हो गया है । इसलिए हम गर्व से कह सकते है-
“मेरा तन-मन-धन, मेरी पहचान है हिंदी
सारी भाषाओ को प्रस्फुटित करने वाली
हर भारतीय का स्वाभिमान है हिंदी ||”
हिंदी भाषा के इस विस्तार में यह निहित है कि गतिशीलता हिंदी का बुनियादी चरित्र है और हिंदी अपनी लचीली प्रकृति के कारण स्वयं को आसानी से बदल लेती है। यह प्रवृत्ति हिंदी के निरंतर विकास का आधार है और जब तक यह प्रवृत्ति है तब तक हिंदी का विकास रुक नहीं सकता। इसलिए यह आवश्यक है कि हम हिंदी का प्रयोग अधिक से अधिक करें, ताकि हिंदी का विकास निरन्तर होता रहे ||

पुष्पा तिवारी
एहल्कॉन इंटरनेशनल स्कूल
मयूर विहार फेस -1 , दिल्ली- 110091




"जूठा गुड़"*

एक शादी के निमंत्रण पर जाना था, पर मैं जाना नहीं चाहता था।

एक व्यस्त होने का बहाना और दूसरा गांव की शादी में शामिल होने से बचना..

लेक‌िन घर परिवार का दबाव था सो जाना पड़ा।

उस दिन शादी की सुबह में काम से बचने के लिए सैर करने के बहाने दो- तीन किलोमीटर दूर जा कर मैं गांव को जाने बाली रोड़ पर बैठा हुआ था, हल्की हवा और सुबह का सुहाना मौसम बहुत ही अच्छा लग रहा था , पास के खेतों में कुछ गाय चारा खा रही थी कि तभी वहाँ एक लग्जरी गाड़ी आकर रूकी,

और उसमें से एक वृद्ध उतरे,अमीरी उसके लिबास और व्यक्तित्व दोनों बयां कर रहे थे।

वे एक पॉलीथिन बैग ले कर मुझसे कुछ दूर पर ही एक सीमेंट के चबूतरे पर बैठ गये, पॉलीथिन चबूतरे पर उंडेल दी, उसमे गुड़ भरा हुआ था, अब उन्होने आओ आओ करके पास में ही खड़ी ओर बैठी गायो को बुलाया, सभी गाय पलक झपकते ही उन बुजुर्ग के इर्द गिर्द ठीक ऐसे ही आ गई जैसे कई महीनो बाद बच्चे अपने मांबाप को घेर लेते हैं, कुछ गाय को गुड़ उठाकर खिला रहे थे तो कुछ स्वयम् खा रही थी, वे बड़े प्रेम से उनके सिर पर गले पर हाथ फेर रहे थे।

कुछ ही देर में गाय अधिकांश गुड़ खाकर चली गई,इसके बाद जो हुआ वो वाक्या हैं जिसे मैं ज़िन्दगी भर नहीं भुला सकता,

हुआ यूँ कि गायो के गुड़ खाने के बाद जो गुड़ बच गया था

वो बुजुर्ग उन टुकड़ो को उठा उठा कर खाने लगे,मैं उनकी इस क्रिया से अचंभित हुआ पर उन्होंने बिना किसी परवाह के कई टुकड़े खाये और अपनी गाडी की और चल पड़े।

मैं दौड़कर उनके नज़दीक पहुँचा और बोला अंकल जी क्षमा चाहता हूँ पर अभी जो हुआ उससे मेरा दिमाग घूम गया, क्या आप मेरी इस जिज्ञासा को शांत करेंगे कि आप इतने अमीर होकर भी गाय का जूठा गुड क्यों खाया ??

उनके चेहरे पर अब हल्की सी मुस्कान उभरी उन्होंने कार का गेट वापस बंद करा और मेरे कंधे पर हाथ रख वापस सीमेंट के चबूतरे पर आ बैठे, और बोले ये जो तुम गुड़ के झूठे टुकड़े देख रहे हो ना बेटे मुझे इनसे स्वादिष्ट आज तक कुछ नहीं लगता।

जब भी मुझे वक़्त मिलता हैं मैं अक्सर इसी जगह आकर अपनी आत्मा में इस गुड की मिठास घोलता हूँ।

मैं अब भी नहीं समझा अंकल जी आखिर ऐसा क्या हैं इस गुड में ???

वे बोले ये बात आज से कोई 40 साल पहले की हैं उस वक़्त मैं 22 साल का था घर में जबरदस्त आंतरिक कलह के कारण मैं घर से भाग आया था, परन्तू दुर्भाग्य वश ट्रेन में कोई मेरा सारा सामान और पैसे चुरा ले गया। इस अजनबी से छोटे शहर में मेरा कोई नहीं था, भीषण गर्मी में खाली जेब के दो दिन भूखे रहकर इधर से उधर भटकता रहा, और शाम को भूख मुझे निगलने को आतुर थी।

तब इसी जगह ऐसी ही एक गाय को एक महानुभाव गुड़ डालकर चले गए ,यहाँ एक पीपल का पेड़ हुआ करता था तब चबूतरा नहीं था,मैं उसी पेड़ की जड़ो पर बैठा भूख से बेहाल हो रहा था, मैंने देखा कि गाय ने गुड़ छुआ तक नहीं और उठ कर वहां से चली गई, मैं कुछ देर किंकर्तव्यविमूढ़ सोचता रहा और फिर मैंने वो सारा गुड़ उठा लिया और खा लिया। मेरी मृतप्रायः आत्मा में प्राण से आ गये।

मैं उसी पेड़ की जड़ो में रात भर पड़ा रहा, सुबह जब मेरी आँख खुली तो काफ़ी रौशनी हो चुकी थी, मैं नित्यकर्मो से फारिक हो किसी काम की तलाश में फिर सारा दिन भटकता रहा पर दुर्भाग्य मेरा पीछा नहीं छोड़ रहा था, एक और थकान भरे दिन ने मुझे वापस उसी जगह निराश भूखा खाली हाथ लौटा दिया।

शाम ढल रही थी, कल और आज में कुछ भी तो नहीं बदला था, वही पीपल, वही भूखा मैं और वही गाय।

कुछ ही देर में वहाँ वही कल वाले सज्जन आये और कुछ गुड़ की डलिया गाय को डालकर चलते बने, गाय उठी और बिना गुड़ खाये चली गई, मुझे अज़ीब लगा परन्तू मैं बेबस था सो आज फिर गुड खा लिया।

और वही सो गया, सुबह काम तलासने निकल गया, आज शायद दुर्भाग्य की चादर मेरे सर पे नहीं थी सो एक ढ़ाबे पर मुझे काम मिल गया। कुछ दिन बाद जब मालिक ने मुझे पहली पगार दी तो मैंने 1 किलो गुड़ ख़रीदा और किसी दिव्य शक्ति के वशीभूत 7 km पैदल पैदल चलकर उसी पीपल के पेड़ के नीचे आया।

इधर उधर नज़र दौड़ाई तो गाय भी दिख गई,मैंने सारा गुड़ उस गाय को डाल दिया, इस बार मैं अपने जीवन में सबसे ज्यादा चौंका क्योकि गाय सारा गुड़ खा गई, जिसका मतलब साफ़ था की गाय ने 2 दिन जानबूझ कर मेरे लिये गुड़ छोड़ा था,

मेरा हृदय भर उठा उस ममतामई स्वरुप की ममता देखकर, मैं रोता हुआ बापस ढ़ाबे पे पहुँचा,और बहुत सोचता रहा, फिर एक दिन मुझे एक फर्म में नौकरी भी मिल गई, दिन पर दिन मैं उन्नति और तरक्की के शिखर चढ़ता गया,

शादी हुई बच्चे हुये आज मैं खुद की पाँच फर्म का मालिक हूँ, जीवन की इस लंबी यात्रा में मैंने कभी भी उस गाय माता को नहीं भुलाया , मैं अक्सर यहाँ आता हूँ और इन गायो को गुड़ डालकर इनका जूठा गुड़ खाता हूँ,

मैं लाखो रूपए गौ शालाओं में चंदा भी देता हूँ , परन्तू मेरी मृग तृष्णा मन की शांति यही आकर मिटती हैं बेटे।

मैं देख रहा था वे बहुत भावुक हो चले थे, समझ गये अब तो तुम,

मैंने सिर हाँ में हिलाया, वे चल पड़े,गाडी स्टार्ट हुई और निकल गई , मैं उठा उन्ही टुकड़ो में से एक टुकड़ा उठाया मुँह में डाला
बापस शादी में शिरकत करने सच्चे मन से शामिल हुआ।

सचमुच वो कोई साधारण गुड़ नहीं था।

उसमे कोई दिव्य मिठास थी जो जीभ के साथ आत्मा को भी मीठा कर गई थी।

घर आकर गाय के बारे जानने के लिए कुछ किताबें पढ़ने के बाद जाना कि.....,

गाय गोलोक की एक अमूल्य निधि है,

जिसकी रचना भगवान ने मनुष्यों के कल्याणार्थ आशीर्वाद रूप से की है। अत: इस पृथ्वी पर गोमाता मनुष्यों के लिए भगवान का प्रसाद है। भगवान के प्रसादस्वरूप अमृतरूपी गोदुग्ध का पान कर मानव ही नहीं अपितु देवगण भी तृप्त होते हैं।

इसीलिए गोदुग्ध को ‘अमृत’ कहा जाता है। गौएं विकाररहित दिव्य अमृत धारण करती हैं और दुहने पर अमृत ही देती हैं। वे अमृत का खजाना हैं। सभी देवता गोमाता के अमृतरूपी गोदुग्ध का पान करने के लिए गोमाता के शरीर में सदैव निवास करते हैं।

ऋग्वेद में गौ को‘अदिति’ कहा गया है। ‘दिति’ नाम नाश का प्रतीक है और ‘अदिति’ अविनाशी अमृतत्व का नाम है। अत: गौ को ‘अदिति’ कहकर वेद ने अमृतत्व का प्रतीक बतलाया है।

सतीश शर्मा जी द्वारा संकलित।


आपकी की कीमत

एक जाने-माने स्पीकर ने हाथ में पांच सौ का नोट लहराते हुए अपनी सेमीनार शुरू की. हाल में बैठे सैकड़ों लोगों से उसने पूछा ,” ये पांच सौ का नोट कौन लेना चाहता है?” हाथ उठना शुरू हो गए.

फिर उसने कहा ,” मैं इस नोट को आपमें से किसी एक को दूंगा पर उससे पहले मुझे ये कर लेने दीजिये .” और उसने नोट को अपनी मुट्ठी में चिमोड़ना शुरू कर दिया. और फिर उसने पूछा,” कौन है जो अब भी यह नोट लेना चाहता है?” अभी भी लोगों के हाथ उठने शुरू हो गए.

“अच्छा” उसने कहा,” अगर मैं ये कर दूं ? ” और उसने नोट को नीचे गिराकर पैरों से कुचलना शुरू कर दिया. उसने नोट उठाई , वह बिल्कुल चिमुड़ी और गन्दी हो गयी थी.

” क्या अभी भी कोई है जो इसे लेना चाहता है?”. और एक बार फिर हाथ उठने शुरू हो गए.

” दोस्तों , आप लोगों ने आज एक बहुत महत्त्वपूर्ण पाठ सीखा है. मैंने इस नोट के साथ इतना कुछ किया पर फिर भी आप इसे लेना चाहते थे क्योंकि ये सब होने के बावजूद नोट की कीमत घटी नहीं,उसका मूल्य अभी भी 500 था.
जीवन में कई बार हम गिरते हैं, हारते हैं, हमारे लिए हुए निर्णय हमें मिटटी में मिला देते हैं. हमें ऐसा लगने लगता है कि हमारी कोई कीमत नहीं है. लेकिन आपके साथ चाहे जो हुआ हो या भविष्य में जो हो जाए , आपका मूल्य कम नहीं होता. आप स्पेशल हैं, इस बात को कभी मत भूलिए.

कभी भी बीते हुए कल की निराशा को आने वाले कल के सपनो को बर्बाद मत करने दीजिये. याद रखिये आपके पास जो सबसे कीमती चीज है, वो है आपका जीवन.”
जीवन जीने की एक कला है।


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